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दुनिया की सबसे मज़बूत मुद्रा डॉलर

दुनिया की सबसे मज़बूत मुद्रा डॉलर
चित्रण: प्रज्ञा घोष | दिप्रिंट

Rupee Vs Dollar: डॉलर के मुकाबले रुपये में गिरावट के साथ शुरुआत, 82.90 के निचले स्तर पर पहुंचा

Rupee Vs Dollar: आज भी अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपये की शुरुआत गिरावट के साथ ही हुई है और रुपया 82.90 रुपये प्रति डॉलर तक नीचे आया है.

By: ABP Live | Updated at : 21 Oct 2022 10:34 AM (IST)

रुपया, डॉलर (फाइल फोटो)

Rupee Vs Dollar: करेंसी बाजार (Currency Market) में रुपये (Indian Rupee) की गिरावट लगातार चिंता का विषय बनी हुई है. आज भी रुपये की शुरुआत गिरावट के साथ ही हुई है. रुपया शुरुआती कारोबार में डॉलर (US Dollar) के मुकाबले 12 पैसे टूटकर 82.90 के स्तर पर आ गया है. हालिया कारोबार में रुपये की भारी गिरावट के बाद ये 83.29 रुपये प्रति डॉलर तक भी नीचे चला गया था जिसके बाद आरबीआई (Reserve Bank of India) की नजरें इस पर बनी हुई हैं.

कल कैसा रहा था रुपये का कारोबार
अंतरबैंक विदेशीमुद्रा विनिमय बाजार में बृहस्पतिवार को अमेरिकी मुद्रा की तुलना में रुपया रिकॉर्ड निचले स्तर से उबरकर 21 पैसे की मजबूती के साथ 82.79 प्रति डॉलर पर बंद हुआ. विदेशों में डॉलर के कमजोर होने के बीच रुपये में मजबूती आई. बाजार सूत्रों ने कहा कि रुपये के 83.29 प्रति डॉलर के रिकॉर्ड निम्न स्तर तक लुढ़कने के बाद संभवत: रिजर्व बैंक ने हस्तक्षेप किया, जिसके कारण स्थानीय मुद्रा में सुधार आया. उन्होंने कहा कि हालांकि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों ने रुपये की तेजी पर अंकुश लगाया.

अंतर-बैंक विदेशी मुद्रा विनिमय बाजार में रुपया 83.05 पर कमजोर खुला और बाद में 83.29 के निचले स्तर तक चला गया. कारोबार के दौरान यह 82.72 के उच्च स्तर पर भी गया. अंत में रुपया बुधवार के बंद भाव के मुकाबले 21 पैसे की मजबूती के साथ 82.79 प्रति डॉलर पर बंद हुआ. इससे पिछले कारोबारी सत्र में रुपया 83 रुपये प्रति डॉलर के रिकॉर्ड निम्न स्तर से भी नीचे चला गया था. दुनिया की छह प्रमुख मुद्राओं दुनिया की सबसे मज़बूत मुद्रा डॉलर के मुकाबले डॉलर की मजबूती को आंकने वाला डॉलर इंडेक्स 0.17 फीसदी गिरकर 112.79 पर आ गया.

करेंसी जानकार का क्या है कहना
एचडीएफसी सिक्योरिटीज के रिसर्च एनालिस्ट दिलीप परमार ने कहा कि चीनी युआन में सुधार और संभवत: केंद्रीय बैंक के हस्तक्षेप के कारण रुपये में शुरुआती गिरावट का रुख पलट गया. उन्होंने कहा कि कल के कारोबार में यह एशिया में सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करने वाली मुद्राओं में से एक रहा. हालांकि आज रुपये में फिर गिरावट के साथ ही शुरुआत हुई है.

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हाल ही में केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने रुपये की लगातार गिरती कीमत पर कहा कि वो इसे ऐसे देखती हैं कि रुपया गिर नहीं रहा है-डॉलर की कीमतें ऊपर जा रही हैं और ये मजबूत हो रहा है.

Published at : 21 Oct 2022 10:29 AM (IST) Tags: Rupee currency dollar rupee vs dollar Dollar index हिंदी समाचार, ब्रेकिंग न्यूज़ हिंदी में सबसे पहले पढ़ें abp News पर। सबसे विश्वसनीय हिंदी न्यूज़ वेबसाइट एबीपी न्यूज़ पर पढ़ें बॉलीवुड, खेल जगत, कोरोना Vaccine से जुड़ी ख़बरें। For more related stories, follow: Business News in Hindi

मुद्राएं मूल्य के भंडार के रूप में कार्य कर सकती हैं और विदेशी मुद्रा की मदद से बाजारों में राष्ट्रों के बीच व्यापार किया जा सकता है, जो विभिन्न मुद्राओं के अनुसार मूल्यों को निर्धारित करते हैं। इन मुद्राओं या करेंसियों को सरकारी मान्यता प्राप्त होती है इसी कारण भारत में रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया इसे जारी करता है।

कौन सी करेंसी है विश्व की सबसे शक्तिशाली करेंसी?
अक्सर हम यो सोचते हैं कि विश्व के सबसे मजबूत देश की करेंसी ही विश्व की सबसे शक्तिशाली करेंसी होगी लेकिन ऐसा नहीं है। विश्व का छोटा सा देश कुवैत जिसकी करेंसी यानी मुद्रा कुवैती दिनार विश्व की सबसे शक्तिशाली मुद्रा है।

कुवैती दीनार को व्यापक रूप से दुनिया की सबसे शक्तिशाली मुद्रा माना जाता है। कुवैती दीनार को संक्षेप में KWD भी कहते हैं। कुवैती दिनार मुद्रा को पहली बार वर्ष 1960 में यूनाइटेड किंगडम से स्वतंत्रता लेने के बाद पेश किया गया था और तब से यह दुनिया की सबसे मूल्यवान मुद्रा बन गई है।

कैसे बनी दिनार सबसे शक्तिशाली करेंसी?
इस करेंसी को विश्व की सबसे मजबूत करेंसी बनाने में इस देश की तेल की खान और इस देश की संतुलित अर्थव्यव्था है सबसे बड़ा कारक है। कुवैत के पास दुनिया के वैश्विक तेल भंडार का नौ प्रतिशत हिस्सा है।

कुवैत की अर्थव्यवस्था तेल निर्यात पर बहुत अधिक निर्भर है दुनिया की सबसे मज़बूत मुद्रा डॉलर क्योंकि इसके पास सबसे बड़ा वैश्विक तेल भंडार है। तेल की इतनी अधिक मांग के साथ, कुवैत की मुद्रा की मांग होना तो लाजमी है। इस देश की एक खास बात ये भी है कि अगर कोई व्यक्ति यहां कार्य करता है तो उसे किसी प्रकार को काई टैक्स नहीं देना पड़ता।

डॉलर और रुपये के साथ संबंध

अगर बात दीनार की डॉलर से संबंध की हो तो 1 कुवैती दीनार 3.32 अमेरिकी डॉलर के बराबर है और भारतीय मुद्रा से अगर तुलना हो तो एक कुवैती दीनार 246 रुपए के दुनिया की सबसे मज़बूत मुद्रा डॉलर बराबर है। इसके साथ ही INR to DINAR एक्सेचेंज रेट विश्व का सबसे लोकप्रिय एक्सचेंज रेट है।

रुपये का गिरना दोहरे घाटे को प्रभावित करेगा लेकिन क्यों घबराने की जरूरत नहीं है

भारत की वृहद अर्थव्यवस्था की बुनियाद मजबूत बनी हुई है. आगे जींसों की अंतरराष्ट्रीय कीमतों में नरमी इस गिरावट की रफ्तार को कम करने में मददगार होगी.

चित्रण: प्रज्ञा घोष | दिप्रिंट

इस सप्ताह रुपये ने पहली बार 80 प्रति डॉलर की सीमा पार कर ली. रुपये में यह गिरावट मुख्यत: भू-राजनीतिक संघर्षों, जींसों की कीमतों में वृद्धि और जोखिम से विदेशी निवेशकों के परहेज का नतीजा है. इन सबके चलते डॉलर मजबूत हुआ है.

रुपये में यह गिरावट सरकारी वित्त व्यवस्था को झटका देगी और चालू खाता घाटे को बढ़ा देगी लेकिन भारत की वृहद अर्थव्यवस्था की बुनियाद मजबूत बनी हुई है इसलिए यह घबराने की वजह नहीं बनेगी. यह 2013 के ‘टेपर टैंट्रम’ प्रकरण के विपरीत है, जब अपने ऊंचे चालू खाता घाटे और विदेशी पूंजी पर निर्भरता के कारण भारत दुनिया की सबसे कुप्रभावित अर्थव्यवस्थाओं में शुमार हो गया था.

आगे चलकर जींसों की अंतरराष्ट्रीय कीमतों में नरमी इस गिरावट की रफ्तार को कम करने में मददगार होगी.

रुपये की गिरावट और डॉलर की मजबूती

अमेरिकी फेडरल रिजर्व ने दरों में जो तीखी वृद्धि की है उससे रुपये पर दबाव बढ़ा है क्योंकि अमेरिका और भारत में ब्याज दरों का अंतर घट गया है. अमेरिकी फेडरल रिजर्व ने पिछली बैठक के बाद 75 बेसिस प्वाइंट की वृद्धि कर दी. जून में अमेरिकी मुद्रास्फीति की उम्मीद से ज्यादा ऊंचे आंकड़े ने अमेरिकी फेडरल रिजर्व की अगली बैठक के बाद दरों में 75 या 100 बेसिस प्वाइंट की वृद्धि की संभावना बढ़ा दी है.

इस तीखी वृद्धि के कारण विदेशी संस्थागत निवेशकों की ओर से बिक्री में तेजी आ जाती है और इससे रुपया और कमजोर होता है. 2022 में अब तक विदेशी निवेशकों ने 30 अरब डॉलर मूल्य की भारतीय परिसंपत्तियों की बिक्री कर डाली है.
रुपये की गिरावट डॉलर सूचकांक की मजबूती से जुड़ी है. डॉलर सूचकांक छह मुद्राओं में डॉलर की ताकत का आकलन करता है. इस साल के शुरू में यह सूचकांक 96 था, जो जुलाई के मध्य में 12 प्रतिशत से ज्यादा बढ़कर 108 पर पहुंच गया. डॉलर सूचकांक में ताजा वृद्धि 40 साल में हुई रिकॉर्ड मुद्रास्फीति और अमेरिकी बॉन्ड पर लाभ में वृद्धि के कारण हुई है. अमेरिकी बॉन्ड पर लाभ में वृद्धि के कारण डॉलर की मांग बढ़ जाती है.

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दोहरे घाटे की समस्या

रुपये में गिरावट भारत के दोहरे घाटे को प्रभावित करेगा. कच्चे तेल, जींसों और खाद की कीमतों में वृद्धि ने आयात के बिल में वृद्धि कर दी है और कमजोर रुपया आयात के बोझ को और भारी कर देगा और सब्सिडी के बोझ को दुनिया की सबसे मज़बूत मुद्रा डॉलर भी बढ़ा देगा.

सरकार ने खाद की ऊंची कीमत का बोझ किसानों पर नहीं डालने का फैसला किया है. इस कारण खाद सब्सिडी 2.5 लाख करोड़ रुपए तक पहुंच सकती है. पेट्रोल और डीजल पर ड्यूटी में कटौती से 85,000 करोड़ रुपए का राजस्व घाटा हो सकता है. लेकिन मुद्रास्फीति के चलते नाममात्र की ऊंची जीडीपी वित्तीय घाटे को सीमित कर सकती है.

रुपये में लगातार गिरावट आयातों पर दबाव डालेगी, जिसके कारण चालू खाता घाटा (सीएडी) बड़ा हो जाएगा. सेवाओं के निर्यात में भारत सामान के निर्यात से ज्यादा प्रतिस्पर्द्धी है इसलिए घाटे में गिरावट मामूली होगी.

मुद्रास्फीति का बुरा दौर खत्म

पिछले कुछ दिनों से जींसों और कच्चे तेल की कीमतों में सुधार हुआ है. संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि दुनिया की सबसे मज़बूत मुद्रा डॉलर संगठन (एफएओ) के खाद्य सामग्री कीमत सूचकांक द्वारा मापी गई वैश्विक कीमतों में जून में लगातार तीसरी बार गिरावट आई. खासकर खाद्य तेल के उप-सूचकांक में मार्च और जून के बीच 15 फीसदी की गिरावट आई.

औद्योगिक धातुओं की कीमतें मार्च में शिखर छूने के बाद अब गिरी हैं. कच्चे तेल की अंतरराष्ट्रीय कीमतें भी मंडी की आशंकाओं की वजह से जुलाई के शुरू से नरम हुई हैं. आयातों की कीमतों में लगातार नरमी भारत के ‘सीएडी’ के लिए अच्छी खबर है. ‘सीएडी’ जिस हद तक काबू में रहेगा मुद्रा की कीमत में ज्यादा गिरावट नहीं होगी.

Early signs of cooling of global commodity inflation | ThePrint Team

अमेरिकी फेडरल रिजर्व की आगामी पॉलिसी के तहत दरों में संभावित वृद्धि का बाजार ने हिसाब लगा लिया है. नतीजतन, एफआईआई भारतीय इक्विटीज़ को बेच रहे हैं लेकिन जुलाई में यह बिक्री घटी है. जुलाई में एफआईआई खरीदार भी बने हैं. जबकि ज़ोर रुपया और डॉलर की दरों पर है लेकिन पाउंड, यूरो, येन जैसी अहम मुद्राओं के मुकाबले रुपये की कीमत बढ़ी है. डॉलर के मामले में रुपये की गिरावट की दर दूसरी विकासशील अर्थव्यवस्थाओं की मुद्राओं की इस दर से कम ही रही है.

While the rupee has depreciated against the dollar, it has appreciated against some other advanced economies

रिजर्व बैंक का हस्तक्षेप

अल्पावधि के लिए रुपये की दिशा अमेरिकी फेडरल रिजर्व की अगली बैठक में दरों में वृद्धि के अनुपात से तय होगी. भारतीय रिजर्व बैंक रुपये की गिरावट को रोकने के लिए हस्तक्षेप करता रहा है. इस मकसद से उसने अपने भंडार में से करीब 50 अरब डॉलर बेच डाले हैं. लेकिन डॉलर जब मजबूत हो रहा है, उस हालात में रुपये का बचाव करना कठिन होगा. विदेशी कर्ज के बारे में रिजर्व बैंक के ताजा आंकड़े बताते हैं कि 43 फीसदी विदेशी कर्ज की अवधि इस साल पूरी हो जाएगी. इसके कारण ज्यादा डॉलर की मांग होगी और यह जमा कोश के प्रबंधन के लिहाज से रिजर्व बैंक के लिए एक चुनौती होगी.

डॉलर की आवक बढ़ाने के लिए पूंजीगत नियंत्रणों का रिजर्व बैंक का ताजा फैसला एक सकारात्मक कदम है. अंतरराष्ट्रीय व्यापार रुपये में करने की इजाजत देने का ताजा फैसला अल्पकालिक तौर पर ज्यादा असर नहीं डालेगा. लेकिन मध्य या दीर्घ अवधि के लिए यह डॉलर की जगह रुपये की मांग की ओर ले जाएगा.

(राधिका पांडे नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक फाइनेंस एंड पॉलिसी में सलाहकार हैं. व्यक्त विचार निजी हैं)

लुढक़ते रुपए को बचाने की चुनौती

इस समय डॉलर के खर्च में कमी और डॉलर की आवक बढ़ाने के रणनीतिक उपाय जरूरी हैं। अब रुपए में वैश्विक कारोबार बढ़ाने के मौके को मुठ्ठियों में लेना होगा। भारतीय रिजर्व बैंक के द्वारा भारत और अन्य देशों के बीच व्यापारिक सौदों का निपटान रुपए में किए जाने संबंधी महत्त्वपूर्ण निर्णय लिया गया है…

हाल ही में अमेरिका के केंद्रीय बैंक फेडरल रिजर्व द्वारा ब्याज दर में इजाफा किए जाने और मौद्रिक नीति को आगे और भी सख्त बनाए जाने के संकेत के साथ-साथ 5 अक्टूबर को तेल उत्पादक देशों के संगठन ओपेक के द्वारा तेल उत्पादन में भारी कटौती पर जिस तरह सहमति व्यक्त की गई है, उससे 7 अक्टूबर को डॉलर के मुकाबले रुपया रिकॉर्ड निचले स्तर पर लुढक़कर 82.33 पर पहुंच गया। रूस-यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद से रुपए में यह सबसे बड़ी गिरावट है। स्थिति यह है कि अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रुपए की ऐतिहासिक गिरावट के बाद कई भारतीय कंपनियां इससे बचने के लिए फॉरवर्ड कवर की कवायद में हैं, क्योंकि उन्हें चिंता है कि फेडरल रिजर्व के ताजा संकेत से इसी वर्ष 2022 में ब्याज दर में और इजाफा हो सकता है, जिससे डॉलर और मजबूत होगा। निश्चित रूप से रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद अब चीन-ताइवान के बीच तनाव और वैश्विक आर्थिक मंदी की आशंकाओं के बीच जिस तरह उससे डॉलर के मुकाबले रुपए की कीमत में बड़ी फिसलन से जहां इस समय भारतीय अर्थव्यवस्था की मुश्किलें बढ़ रही हैं, वहीं आर्थिक विकास दुनिया की सबसे मज़बूत मुद्रा डॉलर योजनाएं प्रभावित हो रही हैं। विदेशी मुद्रा भंडार 30 सितंबर को दो साल के निचले स्तर पर घटकर 533 अरब डॉलर रह गया है। इतना ही नहीं महंगाई से जूझ रहे आम आदमी की चिंताएं और बढ़ती हुई दिखाई दे रही हैं। उर्वरक एवं कच्चे तेल के आयात बिल में बढ़ोतरी होगी। अधिकांश आयातित सामान महंगे हो जाएंगे। यद्यपि रुपए की कमजोरी से आईटी, फार्मा, टेक्सटाइल जैसे विभिन्न उत्पादों के निर्यात की संभावनाएं बढ़ी हैं, लेकिन अधिकांश देशों में मंदी की लहर के कारण निर्यात की चुनौती दिखाई दे रही है।

वस्तुत: डॉलर के मुकाबले रुपए के कमजोर होने का प्रमुख कारण बाजार में रुपए की तुलना में डॉलर की मांग बहुत ज्यादा हो जाना है। वर्ष 2022 की शुरुआत ही संस्थागत विदेशी निवेशक (दुनिया की सबसे मज़बूत मुद्रा डॉलर एफआईआई) बार-बार बड़ी संख्या में भारतीय बाजारों से पैसा निकालते हुए दिखाई दिए हैं। ऐसा इसलिए हुआ है क्योंकि अमेरिका के केंद्रीय बैंक फेडरल रिजर्व के द्वारा अमेरिका में ब्याज दरें बहुत तेजी से बढ़ाई जा रही हैं। दुनिया के कई विकसित देशों के द्वारा भी ब्याज दरें तेजी से बढ़ाई जा रही हैं। ऐसे में भारतीय शेयर बाजार में निवेश करने के इच्छुक निवेशक अमेरिका सहित अन्य विकसित देशों में अपने निवेश को ज्यादा लाभप्रद और सुरक्षित मानते हुए भारत की जगह अमेरिका व विकसित देशों में निवेश को प्राथमिकता भी दे रहे हैं। गौरतलब है कि अभी भी दुनिया में डॉलर सबसे मजबूत मुद्रा है। दुनिया का करीब 85 फीसदी व्यापार डॉलर की मदद से होता है। साथ ही दुनिया के 39 फीसदी कर्ज डॉलर में दिए जाते हैं। इसके अलावा कुल डॉलर का करीब 65 फीसदी उपयोग अमेरिका के बाहर होता है। चूंकि भारत अपनी क्रूड आयल की करीब 80-85 फीसदी जरूरतों के लिए व्यापक रूप से आयात पर निर्भर है। रूस-यूक्रेन युद्ध के मद्देनजर कच्चे तेल और अन्य कमोडिटीज की कीमतों में बढ़ोतरी की वजह से भारत के द्वारा अधिक डॉलर खर्च करने पड़ रहे हैं। साथ ही देश में कोयला, उवर्रक, वनस्पति तेल, दवाई के कच्चे माल, केमिकल्स आदि का आयात लगातार बढ़ता जा रहा है। ऐसे में डॉलर की जरूरत और ज्यादा बढ़ गई है। स्थिति यह है कि भारत जितना निर्यात करता है, उससे अधिक वस्तुओं और सेवाओं का आयात करता है। इससे देश का व्यापार संतुलन लगातार प्रतिकूल होता जा रहा है।

नि:संदेह कमजोर होते रुपए की स्थिति से सरकार और रिजर्व बैंक दोनों चिंतित हैं और इस चिंता को दूर करने के लिए यथोचित कदम भी उठा रहे हैं। रिजर्व बैंक ने रुपए में तेज उतार-चढ़ाव और अस्थिरता को कम करने के लिए यथोचित कदम उठाए हैं और आरबीआई द्वारा उठाए गए ऐसे कदमों से रुपए की तेज गिरावट को थामने में मदद मिली है। आरबीआई ने कहा है कि अब वह रुपए की विनिमय दर में तेज उतार-चढ़ाव की अनुमति नहीं देगा। आरबीआई का कहना है कि विदेशी मुद्रा भंडार का उपयुक्त उपयोग रुपए की गिरावट को थामने में किया जाएगा। अब आरबीआई ने विदेशों से विदेशी मुद्रा का प्रवाह देश की ओर बढ़ाने और रुपए में गिरावट को थामने, सरकारी बांड में विदेशी निवेश के मानदंड को उदार बनाने और कंपनियों के लिए विदेशी उधार सीमा में वृद्धि सहित कई उपायों की घोषणा की है। ऐसे उपायों से एफआईआई पर अनुकूल कुछ असर पड़ा है। इस समय रुपए की कीमत में गिरावट को रोकने के लिए और अधिक उपायों की जरूरत है। इस समय डॉलर के खर्च में कमी और डॉलर की आवक बढ़ाने के रणनीतिक उपाय जरूरी हैं। अब रुपए में वैश्विक कारोबार बढ़ाने के मौके को मुठ्ठियों में लेना होगा। भारतीय रिजर्व बैंक के द्वारा भारत और अन्य देशों के बीच व्यापारिक सौदों का निपटान रुपए में किए जाने संबंधी महत्वपूर्ण निर्णय लिया गया है। विगत 11 जुलाई को भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के द्वारा भारत व अन्य देशों के बीच व्यापारिक सौदों का निपटान रुपए में किए जाने संबंधी निर्णय के बाद इस समय डॉलर संकट का सामना कर रहे रूस, इंडोनेशिया, श्रीलंका, ईरान, एशिया और अफ्रीका के साथ विदेशी व्यापार दुनिया की सबसे मज़बूत मुद्रा डॉलर के लिए डॉलर के बजाय रुपए में भुगतान को बढ़ावा देने की नई संभावनाएं सामने खड़ी हुई दिखाई दे रही हैं।

हाल ही में 7 सितंबर को वित्त मंत्रालय ने सभी हितधारकों के साथ आयोजित बैठक में निर्धारित किया कि बैंकों के द्वारा दो व्यापारिक साझेदार देशों की मुद्राओं की विनिमय दर बाजार आधार पर निर्धारित की जाएगी। निर्यातकों को रुपए में दुनिया की सबसे मज़बूत मुद्रा डॉलर व्यापार करने के लिए प्रोत्साहन और नए नियमों को जमीनी स्तर पर लागू करने की रणनीति तैयार की गई है। इस रणनीति को वाणिज्य मंत्रालय और रिजर्व बैंक आपसी तालमेल से लागू करेंगे। इस परिप्रेक्ष्य में उल्लेखनीय है कि भारत और रूस के बीच द्विपक्षीय कारोबार को आगामी कुछ ही दिनों में एक दूसरे की मुद्राओं में किए जाने की संभावनाएं हंै। इसी तरह भारत के द्वारा अन्य देशों के साथ भी एक दूसरे की मुद्राओं में भुगतान की व्यवस्था सुनिश्चित करने की डगर पर आगे बढ़ रहा है। इससे रुपए को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लेनदेन के लिए अहम मुद्रा बनाने में मदद मिलेगी। इससे जहां व्यापार घाटा कम होगा वहीं विदेशी मुद्रा भंडार घटने की चिंताएं कम होंगी। निश्चित रूप से आरबीआई के इस कदम से भारतीय रुपए को अंतरराष्ट्रीय व्यापार में एक वैश्विक मुद्रा के रूप में स्वीकार करवाने की दिशा में मदद मिलेगी। जिस तरह चीन और रूस जैसे देशों ने अंतरराष्ट्रीय व्यापार में अमेरिकी डॉलर के वर्चस्व को तोडऩे की दिशा में सफल कदम बढ़ाए हैं, उसी तरह अब आरबीआई के निर्णय से भारत की बढ़ती वैश्विक स्वीकार्यता के कारण रुपए को अंतरराष्ट्रीय मुद्रा के रूप में स्थापित करने में भी मदद मिल सकती है।

नि:संदेह रुपए में अत्यधिक उतार-चढ़ाव न तो निर्यातकों के पक्ष में है और न ही आयातकों के लिए फायदेमंद। इसलिए व्यापार से फायदा लेने के लिए रुपया निश्चित रूप से स्थिर स्तर पर होना चाहिए। ऐसे में हम उम्मीद करें कि सरकार द्वारा उठाए जा रहे नए रणनीतिक कदमों से जहां प्रवासी भारतीयों से अधिक विदेशी मुद्रा प्राप्त हो सकेंगी, वहीं उत्पाद निर्यात और सेवा निर्यात बढऩे से भी अधिक विदेशी मुद्रा प्राप्त हो सकेगी और इन सबके कारण डॉलर की तुलना में एक बार फिर रुपया संतोषजनक स्थिति में पहुंचते हुए दिखाई दे सकेगा। इससे देश की आर्थिक मुश्किलें कम होंगी एवं लोगों की महंगाई की पीड़ाएं भी कम होंगी।

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